भय के बावजूद आदिवासियों का प्रयास, परंपराएं रहेंगी जीवंत!

भय के बावजूद आदिवासियों का प्रयास, परंपराएं रहेंगी जीवंत!

बस्तर: डर और भय पर जीत कैसे पाया जा सकता है। इसका बहुत बड़ा उदाहरण है। स्वर्गीय महेंद्र की पुत्री तुललिका कर्मा। जो कि आदिवासी परम्पराओ ढोल नगाड़ों की धुन में फरसपाल के मेले करसाड में अपने कदमो को जमकर थिरकाती नजर आती है। नक्सल प्रभावित दन्तेवाड़ा की ये झलक उसी फरसपाल गांव की है जहाँ आदिवासियों के हितों के लिए नक्सलियों की खिलाफत करने वाले सबसे बड़े जननायक महेंद्र कर्मा रहते थे। जिनकी नक्सलियों ने झीरम हमले में 25 मई 2013 को कांग्रेस काफिले में हमला कर हत्या कर दी थी। उसी गांव में आदिवासी परम्पराओ और संस्कृति की बसाहटों के बीच फरसपाल मेले में उनकी पुत्री तुललिका कर्मा कोया नृत्य में झूम रही है। जो जीवन के रंगों को आदिवासी शैली के बीच जी रही है।

स्वराज एक्सप्रेस टीम ने दन्तेवाड़ा विधायक देवती के गांव फरसपाल मेले में पहुँचकर उनकी आदिवासी शैली को कैमरे में कैद किया। जहाँ मेले के बाद तुललिका कर्मा ने स्वराज एक्सप्रेस से खास बातचीत करते हुए बताया कि करसाड हम आदिवासियों का बड़ा पर्व है। इस मेले में हम बड़े उत्सव की तरह खुशियां मनाते है। जिंदगी जीने के यही रंग है। डर के जीना हमारे पिता ने हमें कभी सिखाया नही। मेला स्व.कर्मा जी के लिए भी एक बड़ा उत्सव की तरह रहा है। साथ ही 60 गांव के मांझी ने इस मेले की जानकारी देते हुए बताया कि मेले के 15 दिन पहले से ढोल नाच शुरू हो जाता है। लड़का लड़की सब मेले में नाचते है झूमते है गाते है। इसे हम कोया नाच कहते है। मेले में बीजापुर,जगदलपुर सब जगह से लोग आते है। सभी जिले के 60 गांवो की देवियां इस मेले आती है। जिनकी पूजा अर्चना करते है। घोटपाल मेले के बाद फरसपाल का मेला पूरे बस्तर में सुप्रसिद्ध मेला है।

मेले में शामिल होने दूर दराज से हजारों की संख्या में ग्रामीण पहुँचे थे। मेले में क्षेत्र के लोग  ईष्ट देवी गुज्जे डोकरी व चिखलादेई मंदिर में पूजा अर्चना होती है। अलग अलग गांव से आंगा देव मेले में पहुँचते है। जहां पारंपरिक आदिवासी परिधान को पहन दन्तेवाड़ा की महिला कांग्रेस  जिलाध्यक्ष तुललिका कर्मा ढोल नृतक दलों के बीच नाचती झूमती घण्टो रही। 


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