ये दानवीर 'चाण्डाल' दान के कपड़े भी कर देता है दान

ये दानवीर 'चाण्डाल' दान के कपड़े भी कर देता है दान

सतना : हिंदुस्तान में धार्मिक आस्था के साथ दान पुण्य का मेला हमेशा लगता रहा है। प्राचीन ग्रंथों और कहानियों में कई दानवीर राजाओं की कहानी सुनी होगी। चाहे राजा हरिश्चन्द्र की दान वीरता की कहानी हो या फिर महाभारत के दानवीर कर्ण की कहानी।

राजा हरिश्चन्द्र ने अपने जीवनकाल में चाण्डाल बनकर अपने ही बेटे का अंतिम संस्कार करने के बदले में अपनी पत्नी से शुल्क के एवज में साड़ी का चीर मांग लिया था। आज हम एक ऐसे ही चाण्डाल के बारे में आपको बता रहे है, जो दान के कपड़ों को दान कर देता है।

यह चाण्डाल सतना के नजीराबाद मुक्तिधाम में लोगों के दाह संस्कार में हाथ बंटाता है। साल भर के दान में मिले वस्त्र इकट्ठे कर वो एक दिन गरीबों के बीच जाकर सारे कपड़े बांट डालता है। चाण्डाल की ये दान वीरता लोगों में किसी प्रेरणा से कम नहीं है।

इस ठंड में गरीबों को कपड़े मिल जाय, तो इससे बेहतर क्या हो सकता है। बाबा जिन कपड़ों को दान करता है, वो कपड़े दरअसल ऐसे कपड़े है, जो उन्हें दान में ही मिले है। जिससे वो अब गरीब की ठंड को दूरकर उनका तन ढक रहा है। आज मिले कपड़ों से गरीबों को भारी राहत मिली है।

बाबा के पास साल भर में लाखों रुपये के चादर, कंबल, कपड़े  इकट्ठे हो जाते है। जिसे वो न तो अपने उपयोग में लेता है और न ही बेचता है, बल्कि गरीबों की जरूरत पूरी करता है। वो लोग जो मंदिरों की सीढ़ी में बैठकर भीख मांग कर अपना पेट पालते हैं, वे आज बेहद खुश है, क्योंकि नए कपड़े उन्हें इस ठंड में नसीब हुए है।

बाबा की दानवीरता गरीब के तन और उसकी जरूरत देखता है, न कि जात और पात। यही वजह की हिन्दू हो या मुस्लिम, सिख हो या ईसाई सभी बाबा के दान में मिले कपड़े से खुश रहते है। राज लालनाथ लगभग 40 साल पहले सतना आये थे।

उन्होंने अपना ठिकाना उस जगह को बनाया, जहां कम से कम जिंदा इंसान आमतौर पर जाने से कतराता है। जी हां, नजीराबाद स्थित मुक्तिधाम को योगिराज ने अपना बसेरा बनाया और चाण्डाल का काम शुरू कर दिया।

अपनों की मौत के बाद दाह संस्कार के लिए मुक्तिधाम पहुंचने वाले ज्यादातर लोग मृतक द्वारा इस्तेमाल किये गए कपड़े चाण्डाल को दानकर चले जाते हैं। मगर यह चाण्डाल न तो उन कपड़ों का इस्तेमाल करता है और न ही किसी को बेचता है, बल्कि पूरे साल कपड़ों को इकठ्ठे करने का काम करता है और एक दिन शहर के जगतदेव तालाब में बैठने वाले भिखारियों को दान कर देता है।

इस मामले में योगिराज का कहना है कि ऐसा करने से उन्हें आत्मिक संतोष मिलता है। किसी गरीब को अगर पेट में रोटी और तन को कपड़ा मिल जाये उसके लिए सबसे अहम है। ऐसे में बाबा का वस्त्र दान किसी पूण्य कर्म से कम नहीं है।

दानवीर चाण्डाल के इस काम को देख सतना में समाज के लोग भी प्रेरित होकर आगे आ रहे है। दानवीर चंण्डाल का यह काम सचमुच अनोखा है। बाबा साल भर में लाखों रुपए के कपडे इकठ्ठे कर गरीबों को दान करता है। बाबा का यह कारनामा उसे खुशी तो देता है, साथ ही लोगो में एक प्रेरणा भरा संदेश दे रहा है। दान किसी भी तरह का किया जाए, पर वो जरूरत मंद की जरूरत पूरी करता है।

 


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