बुन्देला राजाओं की प्राचीन राजधानी रही है ओरछा, अब है राजा राम की नगरी  

बुन्देला राजाओं की प्राचीन राजधानी रही है ओरछा, अब है राजा राम की नगरी  

टीकमगंढ़ः ओरछा विश्व का एकमात्र नगर है, जिसका राजा राम को माना जाता है। ओरछा की स्थापना वर्ष 1501 में रूद्रप्रताप सिंह ने की थी। वीरसिंह देव महान योद्धा रहे है, जिन्होंने इसकी सीमाओं और वैभव में वृद्धि की। उन्होंने ओरछा में मंदिरों, भवनों और दुर्गों का निर्माण कराया। वैसे तो बुदेलखंड के हर शहर और हर गाँव के पास सुनाने को बहुत सी कहानियाँ हैं,पर ओरछा, इतिहास का ऐसा अध्याय है, जो अपने में अनूठी कहानियाँ समाहित किये हुए है।

बुंदेला राज्य के पहले शासक बनारस के गहड़ वाल वंश के सोहनपाल (1261-1268ई.) थे, जो अपने पिता से मतभेद के बाद बुंदेलखंड आ गए थे। ई. 1269 से 1501 ई. तक इस वंश के आठ शासकों ने राज्य किया। ई. 1501 में रूद्रप्रताप शासक बने जो वीर योद्धा थे। इन्होंने मई 1531 में अपनी राजधानी गड़कुण्डार से ओरछा बनायी और इसी वर्ष उनकी मृत्यु हो गयी। रूद्रप्रताप की मृत्यु के बाद उनके पुत्र भारती चंद्र शासक बने। ई.1554 में उनकी मृत्यु के बाद उनके भाई मधुकरशाह शासक बने, जिनके समय राज्य का पराभव हुआ। ई.1577 में ओरछा राज्य पर मुगलों ने अधिकार कर लिया।

रिश्तों की पवित्रता को बनाये रखने के लिये हरदौल ने पी लिया था विष

ई. 1591 में ग्वालियर के आस-पास के क्षेत्र पर अधिकार कर मधुकरशाह ने मुगलों को चुनौती दी, पर मुगल सेना से पराजित हो गये। मधुकरशाह के पुत्र रामशाह ने बाद में मुगल सम्राट अकबर से सुलह कर ली। उन्होंने 1604 ई. तक शासन किया। जब 1605 ई. में जहांगीर दिल्ली का सुल्तान बना तो उसने अपने मित्र वीरसिंह देव को ओरछा का शासक बना दिया। प्रभावशाली व्यक्तिव और दृढ़ आत्म-विश्वास वाले इस शासक ने राज्य की सीमाओं में वृद्धि की। साथ ही मंदिरों, भवनों और दुर्गों का निर्माण कराया। इसके बाद अगले शासक जुझार हुए। खानजहां लोधी ने मुगलो के विरूद्ध विद्रोह किया था, वह 1628 ई. में बिना किसी बाधा के ओरछा के पास से गुजर गया। इससे मुगल नाराज हो गये। किंतु 1602 ई. में जब खानजहां लोधी पुन: ओरछा के पास से गुजर रहा था, तो उस पर हमला कर जुझार ने मुगलों की मैत्री हासिल कर ली। उन्हें मुगलों ने दक्षिण भेज दिया। उनकी अनुपस्थिति में उनके भाई हरदौल शासन चलाते रहे। जब वे दक्षिण से लौटे तो उन्हें अपनी पत्नी और भाई हरदौल की घनिष्ठता पर शंका हुई। उन्होंने भाई को विष पीने के लिये कहा। देवर-भाभी के रिश्तों की पवित्रता को बनाये रखने के लिये हरदौल ने विष पी लिया। उनके इस त्याग ने पूरे बुंदेलखंड में उन्हें अमर बना दिया। आज भी वे लोकगीतों में नायक है। फूलबाग में उनकी समाधि है, जो श्रध्दा का केन्द्र है।

विक्रमाजीत ने टीकमगढ़ को बनाया ओरछा राज्य की राजधानी

ई.1635 से 1641 ई. तक ओरछा शासक विहीन रहा। वर्ष 1641 में मुगल सम्राट शाहजहां ने वीरसिंह के पुत्र पहाड़सिंह को ओरछा का राज्य लौटा दिया। उसके बाद सुजानसिंह ( 1653-72 ई.), इन्द्रमनी ( 1672-75 ई.), जसवंतसिह ( 1675-84 ई.) और भागवंत सिंह ( 1684-89 ई.) शासक रहे। महाराजा उद्योत सिंह ( 1689-35 ई.) के समय बुंदेलखंड पर मराठों के आक्रमण शुरू हुए। धीरे-धीरे बुंदेला राज्य की सीमाएँ कम होने लगी। पृथ्वीसिंह ( 1635-52 ई.) के समय राज्य केवल ओरछा नगर तक सीमित हो गया। बाद के बुंदेला शासक समय-समय पर मुगलों, मराठों और अंग्रेजों की मैत्री से अपनी अस्तिस्व बनाये रहे। ई.1789 में विक्रमाजीत ने ओरछा राज्य की राजधानी को ओरछा से टीकमगढ़ स्थानान्तरित किया। इस परिवर्तन के साथ ही ओरछा के वैभव का पराभव शुरू हो गया। समय और प्रकृति ने ओरछा की सुंदर इमारतों को खंडहरों में बदल दिया है, परन्तु आज ये भवन, मंदिर, दुर्ग अपने वैभव की कहानी कहते हैं। इनमें रामराजा मंदिर, चतुर्भुजी मंदिर, लक्ष्मी मंदिर जैसे भव्य मंदिर है। राजमंदिर, जहाँगीर महल, शीशमहल, राय प्रवीण महल जैसे सुंदर महल है। साथ ही ओरछा के आस-पास का प्राकृतिक और नैसर्गिक सौन्दर्य भी अद्भुत है। 

 


Share
Bulletin