काशी में रंगों से नहीं बल्कि महाश्मशान में भस्म से खेली जाती है होली

काशी में रंगों से नहीं बल्कि महाश्मशान में भस्म से खेली जाती है होली

वाराणसीः होली का पर्व सभी के लिए ख़ास होता है और इस पर्व को लोग बहुत धूम-धाम से मनाते हैं। ऐसे में आप सभी जानते ही होंगे कि होली का पर्व रंगों का पर्व माना जाता है और होली का पर्व बहुत ही ख़ास होता है। आज आपको एक ऐसी जगह के बारे में बताने जा रहे हैं जहाँ होली रंगों से नहीं बल्कि भस्म से खेली जाती है। दरअसल वाराणसी के काशी में भस्म से होली खेलते है। कहा जाता है वहां चिता की राख से लोग होली खेलते है और सदियों से यह एक परम्परा के रूप में चला आ रहा है।

जलती चिताओं से निकाली जाती है गरम भस्म

ऐसा भी कहते हैं कि रंगभरी एकादशी के दिन महादेव भगवती गौरा को विदा कराने और उनके साथ होली खेलने के बाद अगले दिन उनके शिवभक्तों ने चिता भस्म की होली खेली थी। उसी के बाद से यहां यह परंपरा बन गई। आप सभी को बता दें कि यहां महाश्मशान पर दोपहर ठीक 12 बजे श्मशानेश्वर महादेव मंदिर में आरती के बाद जलती चिताओं से निकाली गई गरम भस्म से होली खेलते हैं। इसी के साथ यहाँ होली गीतों पर चिता भस्म उड़ाते हु़ए अड़भंगी भक्त मस्ती में नाचते हुए भी दिखाई दे जाते हैं। महाश्मशान में होने वाली होली में दूर-दूर से लोग आते हैं और धूम-धाम से होली खेलते दिखाई देते हैं। इसी के साथ यहाँ चिताओं से गरम राख निकालकर एक दुसरे को लगाईं जाती है और हवा में उड़ाई भी जाती है। ऐसा भी कहते हैं कि इस होली में इंसान ही नहीं भूत-पिशाच भी शामिल होते हैं।'


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