परंपरा के नाम पर हो रहा अत्याचार

परंपरा के नाम पर हो रहा अत्याचार

बैतूल। बैतूल के भैंसदेही में परम्परा और मनोरंजन के नाम पर मूक पशुओ पर हो रहे अत्याचार को रोकने में कोई आगे नहीं आ रहा, जिससे यह अत्याचार बढता ही जा रहा है मध्य प्रदेश के भैंसदेही में भी ऐसा गन्दा खेल खेला जा रहा है जहां लोग परम्परा के नाम पर बैल गाड़ी दौड़ की प्रतियोगिता के नाम पर बैलो को देते है जख्म, और इस खेल के पीछे लगता है सट्टा। लेकिन प्रशासन को इतनी फुर्सत नहीं की पशुओ पर अत्याचार के इस गंदे खेल को बंद करा सके।

भैंसदेही के गांव कौड़ीढाना में इस साल बैल गाड़ी दौड़ के नाम पर मूक बैलो को गाड़ी में जोत कर रेस लगाने का काम किया जाता है जहां पर हजारो की संख्या में खड़े ये तमासबीन तेज रफ़्तार में दौडती बैल गाडियो को देख कर तालिया बजाते है और चिल्लाते है। इस बैल गाड़ी दौड़ प्रतियोगिता को कहते है पट। इसमें जो बैल गाड़ी पहले आती है उसे इनाम दिया जाता है। इस प्रतियोगिता में कई जिलो से बैल गाड़ी आती है, और इस इनाम को जीतने के लिए बैल मालिक अपने बैलो को तेज भगाते है, बैलो को दौड़ाने के लिए लाठी में लगी नुकीली लोहे की कील को गडाते है जिससे बैलो के शरीर पर घाव लग जाते है, उससे बैलो के शरीर से खून भी निकल जाता है, तड़पते जानवरों की चीख इन मालिको को सुनाई नहीं पड़ती बस उन्हें तो इनाम जीतने की धुन सवार रहती है।

कहने को तो ये बैल मालिक इन बैलो पर लाखों रूपये कर्च करने कि बात करते है लेकिन उन लाखो रुपयों कि उघाई के लिए इन बैलो को पट प्रतियोगिता में दौड़ते है। और नंबर वन आने के लिए इतना प्रताड़ित करते है कि इन बैलो के शरीर से खून कि धार तक बहने लगती है और जब जानवरो को प्रताड़ित करने कि बात पूछी जाती है तो बड़े आसानी से ये कह देते है कि दौड़ में नंबर वन आने के लिए थोडा प्रताड़ित करना ही पड़ता है। वहीं पर अब आगे के सालो मे इस तरह कि प्रताड़ना कि पुनरावृत्ति नहीं करने कि बात कहने लगते है। लोग प्रतियोगिता में शामिल होने के पहले अपने बैलो को दौड़ने के लिए तैयार करते है। और दौड़ जीतने में अपनी पूरी ताकत झोंक देते है यहां तक की अपने बैलो को नुकीली कील से जख्मी कर देते है

इस पट को आयोजन करने वाले लोगो को इस बात से कोई सरोकार नहीं रहता कि उनके इस आयोजन से कितने मूक जानवर इसके शिकार होते है वो तो इस बात से साफ इंकार करने लगते है कि उनके इस आयोजन में जानवरो को किसी तरह से प्रताड़ित नहीं किया जाता। इस घिनोने कार्य के पीछे सट्टेवाज भी सक्रीय होते है, और बैल गाडियो पर सट्टा लगाते है जिससे बैलो की कीमते बढ जाती है।

बैलो पर हो रहे अत्याचार को रोकने के लिए ना कोई एन जी ओ आगे आता है, और ना ही प्रशासन इसलिए परम्परा के नाम पर खुलेआम चलता है ये अत्याचार का खेल। इस खतरनाक खेल को देख कर कई दर्शक दुखी भी हो जाते है पर वे मजबूर है कि कुछ कर नहीं पाते और अपनी नजरो के सामने ही देखते है। लेकिन परम्परा के आगे नतमस्तक है। वही पर इस आयोजन स्थल पर बैलो के दौड़ते समय इन लोगो के मन में डर भी बना रहता है कि कही कोई हदशा न हो जाये लेकिन ये बेमन से इन खेलो का आनंद लेते रहते है

जिस बैल के कारन किसान अपनी खेती करता है और उसके परिवार पालन पोषण होता है ऐसे पशु पर इस तरह का अत्याचार कब तक होगा इसे रोकने के लिए सरकार कोई कदम उठाएगा। जाहिर है पशुओं पर होने वाले अत्याचारों पर लोग आवाज तो खूब उठाते है लेकिन इन्हें रोकने के लिए कभी भी गंभीर कोशिशे नहीं की जाती यही वजह है की बेजान अत्याचार सहने को मजबूर है।


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