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भोपाल लिटरेचर फेस्ट में बस्तर की अनोखी धरोहर: लाल चींटियों की चटनी का जादुई स्वाद

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Jan 11, 2026

भोपाल लिटरेचर फेस्ट में बस्तर की अनोखी धरोहर: लाल चींटियों की चटनी का जादुई स्वाद

भोपाल के प्रतिष्ठित भारत भवन में आयोजित हो रहे साहित्य महोत्सव में इस बार किताबें और विचार ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के बस्तर की आदिवासी संस्कृति और उसके अनूठे व्यंजन भी सुर्खियां बटोर रहे हैं। यहां पहली बार बड़े पैमाने पर पेश की गई चापड़ा चटनी, जो लाल चींटियों से बनती है, ने सभी का ध्यान खींच लिया है। यह न सिर्फ स्वाद की दुनिया में नया प्रयोग है, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और प्रकृति से जुड़े ज्ञान का जीवंत प्रतीक भी है।

 बस्तर की जंगलों से निकली अनमोल विरासत

छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में महुआ और साल के पेड़ों पर लाल चींटियां (रेड एंट्स) ऊंचे घोंसले बनाती हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में चापड़ा कहा जाता है। इन चींटियों और उनके अंडों को इकट्ठा कर सुखाया जाता है, फिर पारंपरिक तरीके से मसालों के साथ पीसकर चटनी तैयार की जाती है। यह व्यंजन बस्तर के आदिवासी समुदायों के लिए सदियों से जीवनरक्षक रहा है, खासकर सूखे और भोजन की कमी के समय में। यह प्रकृति का दिया हुआ उपहार है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से संरक्षित हुआ है।

 स्वास्थ्य के लिए प्राकृतिक कवच

आदिवासी मान्यताओं के अनुसार चापड़ा चटनी में भरपूर फॉर्मिक एसिड होता है, जो एंटी-इंफ्लेमेटरी और इम्यूनिटी बूस्टिंग गुणों से युक्त है। इसका खट्टा-तीखा स्वाद सिट्रिक एसिड जैसा लगता है, जो शरीर को ताकत देता है। पुराने समय में यह सर्दी-जुकाम, बुखार और अन्य बीमारियों से लड़ने का सहारा बनती थी। यहां तक कि कठिन समय में भी आदिवासी समुदायों ने इसे चावल के पेय के साथ इस्तेमाल कर खुद को स्वस्थ रखा। प्रोटीन, कैल्शियम और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर यह चटनी एक प्राकृतिक औषधि की तरह काम करती है।

 सरल लेकिन शानदार बनाने की विधि

इस चटनी को तैयार करना बेहद आसान है। सूखी लाल चींटियों को धनिया, हरी मिर्च, नमक, अदरक और लहसुन के साथ पत्थर पर कूटकर घिसा जाता है। महज ५ से १० मिनट में यह तैयार हो जाती है। जंगल में यह पूरी प्रक्रिया पारंपरिक पत्थरों से की जाती है। सूखाकर रखने के कारण इसकी शेल्फ लाइफ लंबी होती है, इसे आसानी से यात्रा में साथ ले जाया जा सकता है। भोपाल फेस्ट में भी इसे चार-पांच दिन पहले तैयार कर लाया गया, जहां रोजाना लोग इसका स्वाद ले रहे हैं।

भोपाल में मिली-जुली लेकिन उत्साही प्रतिक्रियाएं

फेस्टिवल में पहुंचे लोगों की प्रतिक्रियाएं दिलचस्प रहीं। गैर-शाकाहारी दर्शकों ने इसे चखकर 'स्पाइसी और कमाल का' बताया, जबकि शाकाहारी इसे देखकर हैरान हुए कि चींटियों से भी इतना स्वादिष्ट भोजन बन सकता है। कईयों के लिए यह जीवन का पहला अनोखा अनुभव था। हालांकि चींटियां काटने में तेज होती हैं, लेकिन आदिवासियों का कहना है कि इससे कोई गंभीर नुकसान नहीं होता। यह चटनी न सिर्फ भोजन है, बल्कि बस्तर की संस्कृति, संघर्ष और प्रकृति से जुड़ाव की जीती-जागती कहानी है।

 

Report By:
Monika