खंडवाः जब घोडियों पर सवार होकर हाथ में तलवार थामे निकली दुल्हने, लोगों की नजरे गई ठहर

खंडवाः जब घोडियों पर सवार होकर हाथ में तलवार थामे निकली दुल्हने, लोगों की नजरे गई ठहर

अखिलेश ठाकुर - खण्डवा में जब दो घोडियों पर सवार होकर दो दुल्हने हाथों में तलवार थामे बारात लेकर निकली तो यह दृश्य देखकर लोग ठिठक गए। दरअसल महिलाओं को कार, मोटरसाईकल चलाते देख लोगों को कौतुहल नहीं होता। वो इसके अभ्यस्त हो गए हैं, लेकिन बेटियां यदि घोड़े की सवारी करे तो जरूर लोगों की नज़रे ठहर जाती हैं। खण्डवा में पाटीदार समाज के लिए यह कोई नई बात नहीं, यह उनकी परंपरा का हिस्सा है, लेकिन आम लोगों के लिए जरूर यह बात नई है। खण्डवा में साक्षी और सृष्टि पाटीदार जब दूल्हों की तरह हाथों में तलवार थामे घोड़ी पर सवार होकर अपनी बारात लेकर निकली तो यह दृश्य लोगों के लिए अज़ूबा हो गया। दरअसल आम लोगों ने लड़कियों को सिर्फ फिल्मों में ही घोड़े की सवारी करते देखा है, चाहे वो पद्मावत हो या मणिकर्णिका। इसलिए खण्डवा जैसे कस्बाई मानसिकता के शहर के लिए यह दृश्य कुछ अलग था। राहगीर यह दृश्य देखते ही रुक गए, लेकिन बारातियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। साक्षी और सृष्टि भी इस घुड़सवारी का भरपूर आनंद लेते दिखी। वे घोड़ी पर बैठकर हाथों में तलवार थामे नाचती रही। इधर बाराती भी झूमकर नाच रहे थे।

पाटीदार समाज में बेटियों को घोड़ी पर बैठाकर ही मंडप में ले जाते हैं

पाटीदार परिवार में दो बेटियों की शादी हुई है जिसमें एक है साक्षी, जिसकी शादी आनंद पाटीदार से हुई है और दूसरी सृष्टि जिसकी शशांक पाटीदार हुई है। दोनों लड़कियों का प्रोसेशन निकाला गया तो हमारे लिए तो कुछ नया नहीं था, लेकिन लोगों के लिए थोड़ा कौतुहल का विषय था। हमारे समाज में जब भी बारात निकलती है तो हम बेटे-बेटियों को एक सा दर्जा देते हैं और दोनों ही घोड़ों पर सवार होकर मंडप तक पहुँचते हैं। हमारे समाज में सभी अग्रसर सोच वाले लोग है। कल की जो शादी थी वह पूर्णतः बिना दहेज़ की शादी थी। ये परंपरा हमारे समाज में बरसों से चली आ रही है। हम इसी परम्परा का आज भी पालन कर रहे हैं। हमारे यहाँ तो हर शादी में बेटियों को घोड़ी पर बैठाकर ही मंडप में ले जाते हैं। पाटीदार समाज में यह परंपरा भले पुरानी है लेकिन यह अन्य समाज के लिए एक सबक भी है। बेटे-बेटियों को एक सा दर्ज़ा देने का जो यह प्रयास है उसे सभी अपना ले तो बेटियों को अपना हक मांगने फिर सड़कों पर नहीं उतरना पड़ेगा


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