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4 साल की बच्ची के साथ बर्बरता पर इलाहाबाद हाईकोर्ट: अपराधी की सजा बरकरार, कहा- आरोपी नरमी के लायक नहीं

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Aug 28, 2022

 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चार साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म और निजी अंगों को ब्लेड से काटने के मामले में अपराधी 18 वर्षीय इशरत को सत्र अदालत कानपुर नगर से सुनाई गई तीन साल की सजा को बरकरार रखा। साथ ही आरोपी की जमानत अर्जी को खारिज करते हुए अदालत में बची सजा भुगतने के लिए समर्पण करने का निर्देश जारी किया है। यही नहीं अदालत ने अपीलकर्ता को दी गई अल्पकालिक सजा को चुनौती नहीं देने के लिए राज्य के वकील पर भी असंतोष व्यक्त किया। जस्टिस कृष्ण पहल की खंडपीठ ने ये फैसला सुनाया। बता दें कि 1988 को अपीलकर्ता ने नाबालिग लड़की से रेप का प्रयास करने के बाद उसके निजी अंगों को क्षत-विक्षत करने का अपराध किया था। 

कामवासना में अंधा आरोपी- कोर्ट

अदालत ने कहा कि आरोपी गंभीर कामवासना में अंधा होकर अमानवीय अपराध का दोषी है। वो किसी तरह की नरमी का हकदार नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार का मामले में गंभीर अपराध की अपील ना करना दुखद है। साथ ही अदालत ने अपीलकर्ता को दी गई सजा की अल्पकालिक सजा को चुनौती नहीं देने के लिए राज्य के वकील पर भी असंतोष जाहिर किया। अदालत ने कहा,"यह बहुत खेदजनक स्थिति है कि राज्य ने ट्रायल कोर्ट द्वारा मनाई गई उदारता के खिलाफ किसी भी अपील को प्राथमिकता नहीं दी है।"

क्या है पूरा मामले?

दरअसल 29 नवंबर 1988 को चमनगंज थाने में अज्ञात के नाम FIR दर्ज कराई गई थी। शिकायतकर्ता की नाबालिग बेटी पड़ोसी के घर खेलने गई थी। इसके बाद करीब 3 बजे गांव वालों ने उसे खून से लथपथ पाया और घर ले गए। वो बोलने की हालत में नहीं थी। बच्ची के साख बालात्कार कर उसके प्राइवेट पार्ट को ब्लेड से काटा गया था। पुलिस जांच में आरोपी इशरत को पुलिस ने दोषी पाया और हिरासत में ले लिया। पुलिस ने घटनास्थल से ब्लेड भी बरामद किया था। इसके बाद 20 अक्टूबर 1992 को, अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने इशरत को IPC की धारा 324 (खतरनाक हथियार से चोट) में तीन साल और धारा 354 (किसी महिला का शील भंग करने के लिए) के तहत 2 साल की सजा सुनाई थी। इस फैसले के अपील में चुनौती दी गई। आरोपी ने खुद को नाबालिग बताते हुए उदारता बरतने की मांग की। हालांकि डॉक्टरों की जांच में वह बालिग पाया गया।