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नौ देवियों की प्रतीक हैं कन्याएं

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Oct 4, 2016

नवरात्रि में नौ देवियों- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती में बंटे हैं तीन-तीन दिन। शंकराचार्य ने नारी के सर्वोच्च रूप मां पर लिखा भी है- ‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति’- अर्थात संसार में पुत्र, कुपुत्र पैदा हो सकता है, किन्तु माता कभी कुमाता नहीं हो सकती है। इसलिए नौ देवियों का प्रतीक है कन्या पूजन- कंजकन। मां की इस लीला में यही संकेत है कि बेटी ही मां बनेगी, बहन बनेगी, पत्नी बनेगी, बुआ बनेगी, मौसी बनेगी। हमें सबका सम्मान करना चाहिए। धर्मशास्त्र कहते भी हैं कि जहां महिलाओं का सम्मान है, वहीं लक्ष्मी जी का निवास है।

कन्या पूजन में 10 वर्ष तक की आयु की कन्या को खिलाना उचित रहता है। अष्टमी और नवमी को कन्या पूजन किया जाता है। इस पूजन में कम से कम दो कन्याओं का पूजन आवश्यक है। दो वर्ष की कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमूर्ति, चार वर्ष की कल्याणी, पांच वर्ष की रोहिणी, छह वर्ष की बालिका, सात वर्ष की चंडिका, आठ वर्ष की शाम्भवी, नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष की कन्या सुभद्रा कहलाती है। नवरात्रि व्रत के समाप्त होने पर कन्या पूजन करना परमावश्यक है। एक कन्या के पूजन से ऐश्वर्य, दो के पूजन से भोग और मोक्ष, तीन की पूजा से धर्म, अर्थ व काम, चार की पूजा से सरकारी-राजकीय पद, पांच की पूजा करने से विद्या, छह की पूजा करने से छह प्रकार की सिद्धियां, सात की पूजा से राज्य, आठ की पूजा करने से धन-संपदा और नौ कन्याओं की पूजा से समूची पृथ्वी प्राप्त होती है। इनके साथ एक लंगूर-बालक, जिसे हनुमान माना जाता है, को भी खिलाना जरूरी है।

कन्या पूजन में सर्वप्रथम कन्याओं के पैर धुला कर उन्हें आसन पर एक पंक्ति में बिठाया जाता है। परिवार के सदस्य कन्याओं के पैर धोते हैं। कुमकुम आदि से तिलक करने के उपरांत नौ देवियों का प्रतीक मान उनकी कलाइयों पर कलावा बांधा जाता है। उन्हें हलवा, पूरी, चने, नारियल, फल, चुनरी, दक्षिणा आदि दी जाती है। विदा होते समय उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया जाता है। सनातन धर्म में दो गुप्त और दो जाग्रत नवरात्रि पर्व हमें यह स्मरण कराते रहते हैं कि नारी शक्ति का सदैव सम्मान करना चाहिए। वही महाकाली के रूप में हमारी रक्षा करती है, महालक्ष्मी के रूप में धन प्रदान करती है और महासरस्वती के रूप में विद्या प्रदान करती है।