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कूवगम मंदिर: जहां एक दिन का विवाह और अगले दिन विधवा का विलाप, ट्रांसजेंडर समुदाय का अनोखा उत्सव

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Jan 4, 2026

कूवगम मंदिर: जहां एक दिन का विवाह और अगले दिन विधवा का विलाप, ट्रांसजेंडर समुदाय का अनोखा उत्सव

तमिलनाडु के एक छोटे से गांव कूवगम में स्थित कूथंडावर मंदिर दुनिया का सबसे अनूठा तीर्थस्थल है। यहां हर साल अप्रैल-मई में 18 दिनों तक चलने वाला उत्सव आयोजित होता है, जिसमें हजारों ट्रांसजेंडर लोग देवता अरावन से प्रतीकात्मक विवाह रचाते हैं और अगले ही दिन उनकी 'मृत्यु' पर विधवा की तरह शोक मनाते हैं। यह उत्सव महाभारत की एक प्राचीन कथा पर आधारित है, जो त्याग, समर्पण और समावेश की भावना को जीवंत करता है। देशभर से आने वाले भक्त यहां खुशी और गम के अनोखे मिश्रण का अनुभव करते हैं।

 मंदिर की पौराणिक कथा: महाभारत से जुड़ा रहस्य

कूथंडावर मंदिर, जिसे अरावन मंदिर भी कहा जाता है, महाभारत काल से जुड़ी एक मार्मिक कहानी का गवाह है। अरावन पांडव वीर अर्जुन के पुत्र थे, जिनकी माता नाग कन्या उलूपी थीं। कुरुक्षेत्र युद्ध से पहले पांडवों को विजय के लिए देवी काली को नरबलि देने की सलाह मिली। अरावन ने स्वेच्छा से खुद को बलिदान के लिए प्रस्तुत किया, लेकिन उनकी इच्छा थी कि वे अविवाहित न मरें। कोई राजकुमारी उन्हें पति बनाने को तैयार नहीं हुई, क्योंकि अगले दिन ही उनकी मृत्यु निश्चित थी। तब भगवान कृष्ण ने मोहिनी रूप धारण कर अरावन से विवाह किया और उनकी बलि के बाद विधवा की तरह विलाप किया। इस त्याग ने अरावन को ट्रांसजेंडर समुदाय का आराध्य देवता बना दिया।

 उत्सव की रस्में: विवाह से शोक तक का सफर

चैत्र मास की पूर्णिमा के आसपास शुरू होने वाला यह 18 दिवसीय उत्सव बेहद जीवंत होता है। ट्रांसजेंडर भक्त दुल्हन की तरह सज-धजकर मंदिर पहुंचते हैं। पुजारी अरावन की ओर से उन्हें थाली (मंगलसूत्र) बांधते हैं, जिससे प्रतीकात्मक विवाह संपन्न होता है। रात भर नाच-गाना, उत्सव और खुशियां मनाई जाती हैं। अगले दिन अरावन की बलि का प्रतीकात्मक अभिनय होता है – भक्त अपनी थाली काटते हैं, चूड़ियां तोड़ते हैं, सिंदूर पोंछते हैं और विधवा की तरह रोते-बिलखते हैं। यह विलाप मोहिनी के शोक की याद दिलाता है। उत्सव में सौंदर्य प्रतियोगिता 'मिस कूवगम' भी होती है, जहां विजेता को ताज पहनाया जाता है।

 ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए विशेष महत्व

यह उत्सव ट्रांसजेंडर लोगों के लिए एक बड़ा मिलन स्थल है। यहां वे अपनी पहचान को गर्व से जीते हैं और समाज में स्वीकृति की कामना करते हैं। अरावन को अपना संरक्षक देवता मानकर वे त्याग और कर्तव्य की मिसाल को याद करते हैं। हजारों की संख्या में आने वाले भक्तों के लिए यह धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता का प्रतीक भी है। कूवगम का यह मेला दुनिया भर में अनोखे सांस्कृतिक विरासत के रूप में जाना जाता है।

 

Report By:
Monika